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तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर

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तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर है तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर है तेरी महकी महकी साँसों का पैरहन मैं ओढ़ लूँ, तेरे मख़मली एहसास के कुछ ख़्वाब मैं भी मोल लूँ। तेरी हैरानगी मेरी दीवानगी ये शामो सहर की आवारगी। तू ही बन्दगी तू ही फ़ितूर है। तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर है उम्र की हर शाख़ पे खिलें गुल हमारी चाह के, इस ज़मी से उस फ़लक़ तक मोगरे की बेल से। ये रस्में और ये रिवायतें गूँजे हरसूं इश्क़ की आयतें। यही प्यार का दस्तूर है। तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर है। तेरी साँसों के बिछौने पे मैं करवटें तेरे साथ लूँ, तेरी संदली सी महक से रूह तर अपनी करूँ। मुझे भा गई तेरी सादगी करूँ रात दिन तेरी बन्दगी तुझे इल्म तो ये ज़रूर है तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर है तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर है तेरी तिश्नगी तेरा सुरूर है......।।।। अलका निगम लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️ लखनऊ

अस्तांचल गामी सूर्य

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अस्तांचल गामी सूर्य आसान नहीं होता है अस्तांचल गामी सूर्य होना। उतरना पड़ता है खुद ही अपने शिखर से और....स्वेच्छा से करना पड़ता है अपना स्थान रिक्त। अपने प्रचंड ताप को किसी नदी में डूब करना पड़ता है शांत और निस्तेज हो साँझ के आँचल में छिपना पड़ता है। पर.....सिर्फ़ यही तो नहीं। साँझ के आँचल में छिपने से पहले निस्तेज चन्द्र को अपनी  आभा दे, वो उसके भी अस्तित्व को जीवित रखता है। स्वयंभू नहीं बनता अपितु.... स्वयं अस्त होकर भी तारों को अपना तेज दे उन्हें बनाता है रात्रि का प्रहरी  और.... खुद निश्चिंत हो  शान्त और मौन रह के, करता है नवीन ऊर्जा संचित  ताकि..... फिर से भोर में उदित हो नव दिवस का आवाहन कर सके। दैदीप्यमान हो मनुष्य को कर्म का पाठ पढ़ा सके और.... सृष्टि के आरंभ से आजतक उदित और अस्त होने के बीच अपना कर्तव्य निभा सके। आसान नहीं होता  अस्तांचल गामी सूर्य होना। बुझना पड़ता है फिर से जलने के लिए.....। अलका निगम लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️ लखनऊ

बैकुंठ धाम

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बैकुंठ धाम कल राह में अचानक बैकुंठ धाम पड़ गया और मस्तक ख़ुदबखुद उसके आगे झुक गया। अचानक एहसास हुआ.... यही तो है..... वो अंतिम पड़ाव, जहाँ है जलना  देह का अलाव। जिसकी आंच में जल के कितने ही गुरूर, खण्ड खण्ड होके हो जाते हैं चूर चूर। वो चाँद सा मुखड़ा, वो लाहीम शहीम बदन। सब खाक बन मिट्टी में हो जाते हैं फ़ना। देह से बंधे रिश्ते जो यहीं छूट जाते हैं, अगली सुबह आके लोटे में भर ले जाते हैं। वो भी कहाँ रखते हैं कलेजे से लगा कर, के बहती नदी में बहा के चले जाते हैं। यही सब सोचते विचारते पहुंच गई मैं अपने गंतव्य पे। चमकते हुए कीमती  पत्थरों के बीच, अचानक सारा ज्ञान फ़ना हो गया और तराशे हुए पत्थरों में खो सा गया। चमकते कुछ पत्थर पोटली में बटोर, चल दी मैं वापस आशियाने की ओर। वापसी में फिर से सामना हुआ हक़ीक़त से, राख़ होते जिस्मों के उड़ते धुँए से। इक बारगी फ़िर से मन ने  बैरागी होना चाहा था, पर जिस्म की पकड़ पत्थरों पे थी कस गई। कुछ इस तरह देह फिर से माया में जकड़ गई। अलका निगम लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️ लखनऊ

साँवरी हुई बाँवरी

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साँवरी हुई बाँवरी तुम तो चल दिए...... साँझ का दीपक जला, न जाने किस दिशा में। और...... मैं साँवरी, तेरी बाँवरी तेरे नेह में उतावरी। बाट जोहते तेरी, बीती कितनी ही विभावरी। भोर भए सजल कण्ठ से गाऊँ राग आसावरी। नित साँझ और सखारे तकूँ नयन उघारे। न जाने किस दिशा में तू पवन बन बहा रे। कांकड़ पाथर पंथ के तेरे रोज़ मैं बुहारती। डाकिये की राह भी रोज़ मैं निहारती। बाँध मैंने रखी हैं, दिशाएँ दसों चौखट पे, न जाने किस दिशा से तेरी पाती उड़ के आये री। पर तू तो..... ग्यारहवीं दिशा में मुख मोड़ के है चल दिया। चाँद बना टाँकूं अमावस की रातों में, चाँदनी के जैसा हो  न एक भी ऐसा पल दिया। पर मैं भी....... हिम्मत नहीं हारती हर साँझ ढले लौटती गौवों को मैं निहारती। गोधूलि की धूलि अपने माथे पे सजाती। साँसों में तेरे नाम के घुँघरुओं को बाँधती। चौखट के बाहर लगे कामिनी की के पेड़ तले तेरा नाम लेके रोज़, संझा बाती बारती। इस आस में....... के न जाने कब तू भोर के तारे संग मेरी पूस की ठिठुरती रातों का सूरज बन जाए रे और....... मुझमें जमी बर्फ़ को पल में पिघला जाए रे। अलका निगम लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️ लखनऊ

ए घर

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ए घर....... मुझे पहचानते हो??? कभी रखी थी नींव मैंने तुम्हारी बड़े प्यार से। वक़्त वो अजब सा था हौसला ग़ज़ब सा था। जेब थोड़ी तंग थी पर मन में उमंग थी। कुछ उधार था लिया कुछ जुगाड़ खुद किया। कुछ शौक़ थे अज़ीज़ से जो तुझपे थे क़ुर्बान किये। कुछ सोने के टुकड़े थे जो हमने गिरवीं रख दिये। एक कोना रखा हमने सुबह की धूप के लिए। एक छत का कंगूरा चाँद के नाम कर दिया। ख़ुशबुओं के साये में सँवारने को रिश्ता, एक हरा कोना मोगरे के नाम कर दिया। पर......  वक़्त भी अजीब है। घर को सजाते,सँवारते,निखारते न जाने कितनी रातों को हमने ज़ाया कर दिया। कोना वो धूप का  तरसता ही रह गया, वक़्त न निकाल पाए संग बैठने को हम। चाँद भी कंगूरे पे तन्हा नज़र आता है, के वक़्त को समेटने में पखवारा निकल जाता है। मोगरे की ख़ुशबुओं का मौसम गुज़र जाता है और...... घर ये अचानक मकाँ सा नज़र आता है। अलका निगम लफ़्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️ लखनऊ

तेरी मुस्कान

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ये सत्य शाश्वत जैसी तेरे अधरों की मुस्कान। भृमर भी हो बैरागी जो कर ले इनका पान। प्रेम सुधा बरसाते, ये नयन कटोरे तेरे। पलकें तेरी घनेरी झुकते ही डूबे पाख। कण्ठ है तेरा शँख के जैसा शारद सुंदर बोल। वीणा सा झंकृत हो तन मन है राग तेरी अनमोल। आँचल तेरा हरा धरा सा निर्झर झरने सा तेरा मन। आभा तेरी शुभ्र चंद्र सी हों प्रदीप्त कलुषित मन। रहती है जो जोगन बनके मीरा सी तेरी देह गेह में। आ उसे बसा लूँ मैं उर में ज्यों धवल चंद्र हो सीपी में। अलका निगम लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️ लखनऊ

लिखती हूँ मैं दिल की ज़ुबाँ

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हाँ लिखती हूँ मैं....... दिल की ज़ुबाँ। कभी मेरे अपनों के ग़मों को  आकार देती हूँ मैं लफ्ज़ों का। कभी अपनी ही खुशियों की  इबारत मैं लिखती हूँ। लिख देती हूँ कभी, अनकही अनसुनी सी दास्ताँ। कभी रूमानी सी कहानी की कविता बना देती हूँ। कभी चाँद से बातें  दो चार कर लेती हूँ। कभी साँझ ढले  सूरज की बिंदी लगाती हूँ। कभी उम्र की रसोई के ज़ायके ले आती हूँ। कभी सावन की स्याही से कागज़ मैं रँगती हूँ। कभी जेठ के सूखे ठूँठ की कलम मैं बनाती हूँ। कभी किसी के संघर्षों को दे देती अपनी मैं ज़ुबान। कभी इशारों इशारों में ही अपनी कहानी सुना देती हूँ। पर........ शब्दों की सिलाई  कुछ इस तरह से करती हूँ के रिश्तों की बुनाई उधड़ने न पाए। देखती हूँ धागा न कहीं कच्चा सूत हो, जो टूट के जुड़े तो गाँठ मज़बूत हो। अलका निगम लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️ लखनऊ