साँवरी हुई बाँवरी
साँवरी हुई बाँवरी
तुम तो चल दिए......
साँझ का दीपक जला,
न जाने किस दिशा में।
और......
मैं साँवरी, तेरी बाँवरी
तेरे नेह में उतावरी।
बाट जोहते तेरी,
बीती कितनी ही विभावरी।
भोर भए सजल कण्ठ से
गाऊँ राग आसावरी।
नित साँझ और सखारे
तकूँ नयन उघारे।
न जाने किस दिशा में
तू पवन बन बहा रे।
कांकड़ पाथर पंथ के
तेरे रोज़ मैं बुहारती।
डाकिये की राह भी
रोज़ मैं निहारती।
बाँध मैंने रखी हैं,
दिशाएँ दसों चौखट पे,
न जाने किस दिशा से
तेरी पाती उड़ के आये री।
पर तू तो.....
ग्यारहवीं दिशा में
मुख मोड़ के है चल दिया।
चाँद बना टाँकूं
अमावस की रातों में,
चाँदनी के जैसा हो
न एक भी ऐसा पल दिया।
पर मैं भी.......
हिम्मत नहीं हारती
हर साँझ ढले लौटती
गौवों को मैं निहारती।
गोधूलि की धूलि अपने
माथे पे सजाती।
साँसों में तेरे नाम के
घुँघरुओं को बाँधती।
चौखट के बाहर लगे
कामिनी की के पेड़ तले
तेरा नाम लेके रोज़,
संझा बाती बारती।
इस आस में.......
के न जाने कब तू
भोर के तारे संग
मेरी पूस की ठिठुरती रातों का
सूरज बन जाए रे
और.......
मुझमें जमी बर्फ़ को
पल में पिघला जाए रे।
अलका निगम
लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️
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