तेरी मुस्कान

ये सत्य शाश्वत जैसी
तेरे अधरों की मुस्कान।
भृमर भी हो बैरागी
जो कर ले इनका पान।

प्रेम सुधा बरसाते,
ये नयन कटोरे तेरे।
पलकें तेरी घनेरी
झुकते ही डूबे पाख।

कण्ठ है तेरा शँख के जैसा
शारद सुंदर बोल।
वीणा सा झंकृत हो तन मन
है राग तेरी अनमोल।

आँचल तेरा हरा धरा सा
निर्झर झरने सा तेरा मन।
आभा तेरी शुभ्र चंद्र सी
हों प्रदीप्त कलुषित मन।

रहती है जो जोगन बनके
मीरा सी तेरी देह गेह में।
आ उसे बसा लूँ मैं उर में
ज्यों धवल चंद्र हो सीपी में।

अलका निगम
लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️
लखनऊ

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