बैकुंठ धाम

बैकुंठ धाम

कल राह में अचानक
बैकुंठ धाम पड़ गया
और मस्तक ख़ुदबखुद
उसके आगे झुक गया।
अचानक एहसास हुआ....
यही तो है.....
वो अंतिम पड़ाव,
जहाँ है जलना 
देह का अलाव।
जिसकी आंच में जल के
कितने ही गुरूर,
खण्ड खण्ड होके
हो जाते हैं चूर चूर।
वो चाँद सा मुखड़ा,
वो लाहीम शहीम बदन।
सब खाक बन मिट्टी में
हो जाते हैं फ़ना।
देह से बंधे रिश्ते
जो यहीं छूट जाते हैं,
अगली सुबह आके
लोटे में भर ले जाते हैं।
वो भी कहाँ रखते हैं
कलेजे से लगा कर,
के बहती नदी में
बहा के चले जाते हैं।
यही सब सोचते विचारते
पहुंच गई मैं अपने गंतव्य पे।
चमकते हुए कीमती 
पत्थरों के बीच,
अचानक सारा ज्ञान
फ़ना हो गया
और तराशे हुए पत्थरों में
खो सा गया।
चमकते कुछ पत्थर
पोटली में बटोर,
चल दी मैं वापस
आशियाने की ओर।
वापसी में फिर से
सामना हुआ हक़ीक़त से,
राख़ होते जिस्मों के
उड़ते धुँए से।
इक बारगी फ़िर से मन ने 
बैरागी होना चाहा था,
पर जिस्म की पकड़
पत्थरों पे थी कस गई।
कुछ इस तरह
देह फिर से
माया में जकड़ गई।

अलका निगम
लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️
लखनऊ

Comments

Popular posts from this blog

अस्तांचल गामी सूर्य

तेरी मुस्कान