लिखती हूँ मैं दिल की ज़ुबाँ

हाँ लिखती हूँ मैं.......
दिल की ज़ुबाँ।
कभी मेरे अपनों के ग़मों को 
आकार देती हूँ मैं लफ्ज़ों का।
कभी अपनी ही खुशियों की 
इबारत मैं लिखती हूँ।
लिख देती हूँ कभी,
अनकही अनसुनी सी दास्ताँ।
कभी रूमानी सी कहानी की
कविता बना देती हूँ।
कभी चाँद से बातें 
दो चार कर लेती हूँ।
कभी साँझ ढले 
सूरज की बिंदी लगाती हूँ।
कभी उम्र की रसोई के
ज़ायके ले आती हूँ।
कभी सावन की स्याही
से कागज़ मैं रँगती हूँ।
कभी जेठ के सूखे ठूँठ की
कलम मैं बनाती हूँ।
कभी किसी के संघर्षों को
दे देती अपनी मैं ज़ुबान।
कभी इशारों इशारों में ही
अपनी कहानी सुना देती हूँ।
पर........
शब्दों की सिलाई 
कुछ इस तरह से करती हूँ
के रिश्तों की बुनाई
उधड़ने न पाए।
देखती हूँ धागा न कहीं
कच्चा सूत हो,
जो टूट के जुड़े तो
गाँठ मज़बूत हो।

अलका निगम
लफ्ज़ों की पोटली✍️✍️✍️
लखनऊ

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